कोटरी नदी, छत्तीसगढ़

Kotari River

Kotari River यह इन्द्रावती की सबसे बड़ी सहायक नदी है। इसका उद्गम दुर्ग जिले से हुआ है। इसका अप्रवाह क्षेत्र दक्षिण-पश्चम सीमा पर राजनांदगांव की उच्च भूमि मोहाला तहसील पर है।

डंकिनी और शंखिनी नदी – ये दोनों इन्द्रावती की सहायक नदियां है। डंकिनी नदी किलेपाल एवं पाकनार की डांगरी-डोंगरी से तथा शंखिनी नदी बैलाडीला की पहाड़ी के 4,000 फीट ऊंचे नंदीराज शिखर से निकलती है। इन दोनों नदियों का संगम दन्तेवाड़ा में होता है।इस नदी का अपवाह क्षेत्र दक्षिण-पश्चिम सीमा पर राजनांदगाँव के उच्च भूमि में है।

यह उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हुई राजनांदगाँव, कांकेर, बस्तर ज़िलों में होती हुई महाराष्ट्र में प्रवेश कर बस्तर ज़िले की सीमा पर इन्द्रावती जो कि ज़िले की सीमा बनाती है तथा इन्द्रावती नदी के उत्तरी छोर में मिल जाती है।

मेरे देश की धरती सोना उगले , उगले हीरा मोती मेरे देश की धरती, उपकार फिल्म का यह गाना तो आप सभी ने सुना ही होगा। इसी तर्ज पर यहां बस्तर की नदियां भी सोना उगलती है। 

सोने के कण- बस्तर की कोटरी नदी एक ऐसी नदी है जिसमें सोने के कण मिलते है। कई पीढ़ियों से सोनझरिया समाज के लोग कोटरी नदी की बालू से सोने के कण निकालने का कार्य करते आ रहे है। कोटरी नदी राजनांदगांव जिले के मोहला तहसील से निकलकर कांकेर नारायणपुर में प्रवाहित होती है।

यह नदी इन्द्रावती की प्रमुख सहायक नदी है। इस नदी को परलकोट नदी के नाम से भी जाना जाता है। दुर्गकोंदल क्षेत्र में बहने वाली यह नदी छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद परलकोट के जमींदार गेंदसिंह की शहादत का स्मरण कराती है। 

यह नदी उत्तर बस्तर की प्यास बुझाते हुये सोनझरिया लोगों को रोजगार उपलब्ध कराती है। सोनझरिया लोगो नदी की मिटटी को डोंगीनुमा छोटे बर्तनों में एकत्रित कर लेते है। उसमें से महिन कणों को धोकर एवं छान कर अलग कर लेते है। उन महिन कणों को पिघलाया जाता है। कणो को पिघलाकर सोने का रूप दिया जाता है जिसे क्वारी सोना कहा जाता है। कोटरी नदी में यह सोना कहां से आता है इसकी अभी तक कोई भी जानकारी प्राप्त नहीं हुई है। 

इसके अलावा बस्तर के शबरी नदी में भी सोने के कण पाये जाते है। प्राचीन नल-नाग युगीन बस्तर में भी सोने के सिक्के चलते थे। अभी कुछ दिनों पहले सुकमा में सोने के सिक्कों से भरे हुये दो कलश मिले थे। 

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