बूढ़ी माई मंदिर,रायगढ़

Jai Buddhi Mai

Jai Buddhi Mai जिले में कई ख्यातिप्राप्त माता के मंदिर हैं। इनमें कुछ की विशेषता और महत्ता के बारे में हम आपको बताएंगे। इन्हीं मंदिरों में एक मंदिर शहर के दरोगापारा स्थित बूढ़ीमाई का मंदिर है।

बूढ़ी माई मंदिर,रायगढ़ जिले मे बहुत ही आकर्षक दर्सनीय स्थल है, जहा प्रति वर्ष को मां बूढ़ी माई की भव्य कलश यात्रा शहर में बड़ी धूमधाम से निकाली जाती है। जिसकी तैयारी को लेकर नवयुवकों में भारी उत्साह नजर आता है। इस कलश यात्रा को सफल बनाने के लिए नवयुवक पूरे दिल से जुटे हुए रहते है। यह बहुत ही रमणीय स्थल है जहा हर साल लोगों का जमावड़ा रहता है

कलश यात्रा 8 मार्च को प्रात: 7 बजे से निकलकर विभिन्न मार्गो से होते हुए करबला तालाब स्थित बूढ़ी माई मंदिर पहुंचेगी और मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद वापस धर्मशाला प्रस्थान करेगी। तत्पश्चात दोपहर 1 बजे से विशाल भंडारा का आयोजन किया गया है। कलश यात्रा में नौ कन्याएं 9 देवी के रूप में शहर में लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहती है तथा कर्मा नृत्य एवं देवेश शर्मा का जसगीत भी जुलूस की भव्यता में चार-चांद लगा देती है।

मां के नौ रूपों की है अलग-अलग मान्यता
शैलपुत्री
नवरात्रि की पूजा के दौरान सबसे पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मां दुर्गा का सबसे पहला स्वरूप शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है। इनका नाम पर्वतराज हिमालय के घर बेटी के रूप में जन्म लेने के कारण शैलपुत्री पड़ा। शैलपुत्री मां को सफ़ेद चीजों का भोग लगाया जाना चाहिए। इससे मां प्रसन्न होती हैं।

ब्रह्मचारिणी
नवरात्र में दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी रूप की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी ने भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इसलिए उन्हें ब्रम्हचारिणी के नाम से जाना जाता है। मां को चीनी मिश्री काफी पसंद है इसलिए मां को इसी का भोग पंचामृत के साथ लगाया जाता है। इससे मां प्रसन्न होती हैं।

चंद्रघंटा
माता के इस रूप की पूजा नवरात्रि के तीसरे दिन की जाती है। भगवान शिव के साथ विवाह के बाद देवी ने मस्तक पर घंटे के आकार जैसा आधा चंद्र धारण करना शरू कर दिया था। इसीलिए इनको चंद्रघंटा कहा जाता है। मां दूध से बनी चीजें जैसे खीरए रबड़ीए दूध के पेड़े आदि का भोग लगाने से प्रसन्न होती हैं।

कुष्मांडा
नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा की जाती है। अपनी हल्की से हंसी के द्वारा ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण मां को कुष्मांडा के नाम से जाना जाता है। माता को आदिशक्ति भी कहा जाता है। मां मालपुआ का भोग लगाने से प्रसन्न होती हैं।

स्कंदमाता
नवरात्रि के पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है। इनकी उपासना से सारी इच्छाएं पूरी होती हैं। पहाड़ों पर रहकर सांसारिक जीवों में नवचेतना का निर्माण करने से मां को स्कंदमाता कहा जाता है। मां को पका केला बेहद पसंद है। इका भोग लगाने से मां प्रसन्न होती हैं।

कात्यायनी
नवरात्रि के छठवें दिन देवी कात्यायनी की पूजा की जाती है। कात्य गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन ने भगवती पराम्बा की कठिन तपस्या की थी। मां भगवती ने प्रसन्न होकर महर्षि के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। इसलिए माता को कात्यायनी के नाम से जाना जाता है। मां शहद का भोग लगाने से प्रसन्न होती हैं।

कालरात्रि
नवरात्रि के सातवें दिन देवी कालरात्रि की पूजा की जाती है। देवी कालरात्रि को प्रलयंकार माना जाता है। जिनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। मां काल से रक्षा करने वाली शक्ति हैं। गुड़ का भोग लगाने से मां प्रसन्न होती हैं।

महागौरी
नवरात्रि के आठवें दिन मां गौरी की पूजा की जाती है। इनकी पूरी मुद्रा बहुत शांत है। पति के रूप में शिव को प्राप्त करने के लिए महागौरी ने कठोर तपस्या की थी। इसी वजह से इनका शरीर काला पड़ गया लेकिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इनके शरीर को गंगा के जल की तरह पवित्र बना दिया। नारियल का प्रसाद चढ़ाने से मां प्रसन्न होती हैं।

सिद्धिदात्री
नवरात्रि के आखिरी दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही सिद्धियों को प्राप्त किया था। इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था और उन्हें श्अद्र्धनारीश्वर्य के नाम से जाना जाता है। मां सफेद तिल का भोग लगाने से प्रसन्न होती हैं।

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