joharcg.com आदिम जाति विकास मंत्री श्री रामविचार नेताम ने कहा है कि जनजातीय समाज की प्रकृति के प्रति अटूट आस्था ही आज जल, जंगल और जमीन के संरक्षण का मुख्य आधार है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आदिवासी संस्कृति में पेड़-पौधों और पहाड़ों में देवी-देवताओं का वास माना जाता है, जिसके कारण ये समुदाय सदियों से पर्यावरण का संवर्धन कर रहे हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है (लोकल इम्पैक्ट): छत्तीसगढ़ जैसे वन-बाहुल्य राज्य में यह बयान जनजातीय अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण के बीच के गहरे संबंध को रेखांकित करता है। इससे स्थानीय समुदायों को वनों के संरक्षण के लिए और अधिक प्रोत्साहन मिलेगा और पारंपरिक ज्ञान को सरकारी नीतियों में महत्व मिलने की संभावना बढ़ेगी।
प्रकृति और परंपरा का अनूठा संगम

मंत्री रामविचार नेताम ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि जनजातीय जीवन शैली पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर है और वे प्रकृति को नुकसान पहुँचाना पाप समझते हैं। उन्होंने बताया कि बस्तर से लेकर सरगुजा तक, आदिवासियों ने अपनी परंपराओं के माध्यम से वनों को सुरक्षित रखा है। जहाँ आधुनिक समाज पर्यावरण संकट से जूझ रहा है, वहीं जनजातीय समाज की ‘देवगुड़ी’ और ‘सरना स्थल’ जैसी मान्यताएं जैव विविधता को बचाने में ढाल का काम कर रही हैं।
उन्होंने विभागीय अधिकारियों को निर्देश दिया कि जनजातीय क्षेत्रों में विकास कार्यों के साथ-साथ उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासतों को भी संरक्षित किया जाए। सरकार की योजना है कि इन आस्था केंद्रों के आसपास के वनों को ‘हेरिटेज वन’ के रूप में विकसित किया जाए ताकि भावी पीढ़ी भी इस परंपरा से जुड़ सके।
आदिम जाति विकास मंत्री श्री रामविचार नेताम ने कहा कि देश के लगभग सभी राज्यों में जनजातीय समुदाय के लोग निवास करते हैं। उन्होंने कहा कि 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 10 करोड़ से अधिक जनजातीय समुदाय हैं। उन्होंने कहा कि जनजातीयों का जल, जंगल, जमीन, नदी-नालों और पहाड़ों में अटूट आस्था है। जनजातीय समुदाय पेड़ पौधों, नदी-नालों में देवी-देवताओं का वास मानते हैं और इन्ही संस्कृति और परंपराओं के कारण वनवासी समुदाय प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन में पहले पायदान पर है।

मंत्री श्री नेताम ने आज नवा रायपुर स्थित जनजातीय अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान में आयोजित दो दिवसीय राज्य-स्तरीय संवाद सम्मेलन ’छत्तीसगढ़ कॉमन्स क्विनिंग’ के समापन समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि सामुदायिक संसाधनों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए गहन मंथन हुआ है। इस मंथन में जो भी तथ्य निकलकर आएंगे उसकी उपयोगिता नीति निर्माण और जनहित में कैसी होगी इसके लिए हमारी सरकार तत्परता के साथ काम करेगी।
मंत्री श्री नेताम कहा कि राज्य सरकार जनजातीय समुदायों के विभिन्न समस्याओं और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन के लिए एक उच्च स्तरीय टास्क फोर्स का गठन करने जा रही है। इस टास्क फोर्स की संवेदनशीलता और महत्व को देखते हुए इसकी कमान स्वयं मुख्यमंत्री संभालेंगे, जो इसके अध्यक्ष होंगे। नीतिगत निर्णयों के धरातल पर प्रभावी और समयबद्ध क्रियान्वयन के लिए विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों को मिलाकर एक विशेष कार्यान्वयन समिति भी बनाई जाएगी, जो बेहतर समन्वय सुनिश्चित करेगी ।
श्री नेताम ने कहा कि पेसा (पंचायत उपबंध अधिनियम) और एफआरए (वनाधिकार अधिनियम) के क्रियान्वयन के दौरान आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों, विशेष रूप से सीमाओं के निर्धारण (डिमार्केशन ऑफ बॉउंड्रिस) जैसी समस्याओं को प्राथमिकता के आधार पर हल करने की बात कही। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के प्रति उत्तरदायित्व का भाव जागृत करते हुए कहा, “हम केवल इन साझा संसाधनों के उपयोगकर्ता ही नहीं, बल्कि इनके संरक्षक भी हैं, और हमारा उपभोग केवल अपनी वास्तविक आवश्यकताओं की पूर्ति तक ही सीमित होना चाहिए”। इस टास्क फोर्स का मुख्य उद्देश्य राज्य भर में जनजातीय कल्याण से जुड़ी नीतियों के क्रियान्वयन में आने वाली बाधाओं को दूर करना और समुदायों को उनके अधिकार दिलाना है ।

