joharcg.com महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े ने विभागीय समीक्षा के दौरान अधिकारियों को निर्देशित किया है कि प्रदेश के आंगनबाड़ी केंद्रों को केवल पोषण आहार वितरण तक सीमित न रखा जाए। उन्होंने जोर देकर कहा कि इन केंद्रों को ‘संस्कार निर्माण की पाठशाला’ के रूप में विकसित किया जाए, जहां बच्चों की नींव को नैतिक मूल्यों के साथ मजबूत किया जा सके।
क्यों महत्वपूर्ण है (लोकल इम्पैक्ट): छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्थित हजारों आंगनबाड़ी केंद्र बच्चों के विकास की पहली सीढ़ी हैं। यदि यहाँ पोषण के साथ-साथ बेहतर संस्कार और प्रारंभिक शिक्षा मिलेगी, तो आने वाली पीढ़ी मानसिक और शारीरिक रूप से अधिक सक्षम होगी, जिससे प्रदेश के मानव विकास सूचकांक (HDI) में सुधार होगा।
खेल-खेल में दी जाएगी नैतिक शिक्षा

मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने कहा कि बचपन के शुरुआती वर्ष सीखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। उन्होंने निर्देश दिए कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बच्चों को खेल, कहानियों और गीतों के माध्यम से सांस्कृतिक मूल्यों और अनुशासन की जानकारी दें। मंत्री ने केंद्रों में स्वच्छता और बच्चों के अनुकूल वातावरण तैयार करने पर भी विशेष ध्यान देने को कहा है।
समीक्षा बैठक में उन्होंने महतारी वंदन योजना और अन्य महिला कल्याणकारी योजनाओं की प्रगति की भी जानकारी ली। उन्होंने स्पष्ट किया कि आंगनबाड़ी केंद्रों की निगरानी कड़ाई से की जाए ताकि बच्चों को मिलने वाले गर्म भोजन की गुणवत्ता बनी रहे। मंत्री ने अधिकारियों से कहा कि वे स्वयं समय-समय पर केंद्रों का औचक निरीक्षण करें और कार्यकर्ताओं की समस्याओं का त्वरित निराकरण करें।
महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े ने कहा कि आंगनबाड़ी केंद्रों को केवल पोषण और पूर्व-प्राथमिक शिक्षा तक सीमित न रखते हुए उन्हें ‘संस्कार निर्माण की पाठशाला’ के रूप में विकसित करना समय की आवश्यकता है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि 3 से 6 वर्ष की आयु बच्चों के सर्वांगीण विकास की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था होती है, जिसमें दिए गए संस्कार जीवनभर उनकी सोच और व्यवहार को दिशा देते हैं।

मंत्री श्रीमती राजवाड़े अपने निवास कार्यालय में आयोजित बैठक में राज्य शैक्षणिक अनुसंधान केंद्र के ईसीसीई के राज्य स्तरीय रिसोर्स पर्सन एवं विभागीय अधिकारियों से चर्चा कर रही थीं। बैठक में प्रदेश के 52,518 आंगनबाड़ी केंद्रों के बच्चों को संस्कारपरक शिक्षा से जोड़ने के लिए ठोस पहल करने पर विचार किया गया।
उन्होंने कहा कि बच्चे का पहला विद्यालय उसका घर और आंगनबाड़ी होता है, इसलिए यहां दी जाने वाली शिक्षा में भारतीय जीवन मूल्यों का समावेश अत्यंत आवश्यक है। संस्कारपरक शिक्षा का उद्देश्य बच्चों में प्रारंभिक अवस्था से ही बड़ों का सम्मान, सत्य बोलना, स्वच्छता, अनुशासन, प्रकृति प्रेम तथा ‘धन्यवाद’ और ‘क्षमा’ जैसे व्यवहारिक गुणों का विकास करना है।
मंत्री ने आंगनबाड़ी केंद्रों में इस प्रकार की शिक्षा को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए कई व्यवहारिक सुझाव दिए। उन्होंने दिन की शुरुआत प्रार्थना, योग और प्राणायाम से करने, पंचतंत्र एवं लोककथाओं के माध्यम से नैतिक शिक्षा देने, त्योहारों और महापुरुषों की जयंती के जरिए सांस्कृतिक जुड़ाव बढ़ाने, तथा दैनिक व्यवहार में ‘नमस्ते’, स्वच्छता और अनुशासन को शामिल करने पर बल दिया। साथ ही बच्चों में श्रम के प्रति सम्मान और प्रकृति प्रेम विकसित करने के लिए पौधारोपण एवं स्वच्छता जैसे छोटे-छोटे कार्यों को दिनचर्या का हिस्सा बनाने की बात कही।

