Giroudpuri dham

Giroudpuri dham बलौदाबाजार से 40 किमी दूर तथा बिलासपुर से 80 किमी दूर महानदी और जोंक नदियों के संगम से स्थित, गिरौधपुरी धाम छत्तीसगढ़ के सबसे सम्मानित तीर्थ स्थलों में से एक है। इस छोटे से गांव, जिसमें आध्यात्मिकता और ऐतिहासिक हित के गहरे संबंध हैं, छत्तीसगढ़ के सतनामी पंथ, गुरु घासीदास के संस्थापक का जन्मस्थान है। इस क्षेत्र के एक किसान परिवार में पैदा हुए, एक दिन वह छत्तीसगढ़ में एक बहुत सम्मानित व्यक्ति गुरु घासीदास बन गया। तीर्थयात्रियों ने उन्हें ‘सीट’ पर पूजा करने के लिए यहां पहुंचाया, जो जेट खंबा के बगल में स्थित है। कहा जाता है कि उन्होंने औरधारा वृक्ष के नीचे लंबे समय तक तपस्या की है जो अभी भी वहां है। इस पवित्र स्थान को तपोबुमी भी कहा जाता है। चरन कुंड एक पवित्र तालाब और वार्षिक गिरौदपुरी मेला की साइट है। यहां से एक और किलोमीटर प्राचीन अमृत कुंड स्थित है, जिसका पानी मीठा माना जाता है।

कुतुब मीनार से भी ऊंचा है छत्तीसगढ़ का नया-नवेला जैतखाम

छत्तीसगढ़ की राजधानी से करीब 145 किलोमीटर दूर स्थित बाबा गुरु घासीदास की जन्मस्थली गिरौदपुरी, जहां विशाल स्तंभ ‘जैतखाम’ का निर्माण किया गया है. यह स्तंभ दिल्ली की कुतुब मीनार से भी ज्यादा ऊंचा है. यह स्तंभ कई किलोमीटर दूर से ही दिखने लगता है.

छत्तीसगढ़ की राजधानी से करीब 145 किलोमीटर दूर स्थित बाबा गुरु घासीदास की जन्मस्थली गिरौदपुरी, जहां विशाल स्तंभ ‘जैतखाम’ का निर्माण किया गया है. यह स्तंभ दिल्ली की कुतुब मीनार से भी ज्यादा ऊंचा है. यह स्तंभ कई किलोमीटर दूर से ही दिखने लगता है. सफेद रंग के इस स्तंभ का वास्तुशिल्प इतना शानदार है कि दर्शकों की आंखें ठिठक जाती हैं. दिन ढलते ही दूधिया रोशनी में जैतखाम की भव्यता देखते ही बनती है.

बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के गिरौदपुरी धाम में दुनिया के सबसे ऊंचे जैतखाम का लोकार्पण किया गया। गुरु घासीदास जयंती के अवसर पर २०१५ में मुख्यमंत्री रमन सिंह के द्वारा जैतखाम का लोकार्पण किया। जैतखाम का निर्माण काम २००७-८ से २०१२ तक चला।

गिरौदपुरी सतनामी समाज के लोगों का सबसे बड़ा धार्मिक स्थल है. यहां हर साल फागुन पंचमी से तीन दिन का मेला लगता है, जिसमें पांच लाख से भी ज्यादा लोग हिस्सा लेते हैं. हालांकि सालभर यहां भक्तों का आना-जाना लगा रहता है.

कसडोल के इंजीनियर अखिलेश तिवारी बताते हैं कि गिरौदपुरी का जैतखाम वास्तुशिल्प का बेजोड़ नमूना है. इसकी सुंदरता देखते ही बनती है. जैतखाम की छत पर जाने के लिए दो तरफ से प्रवेशद्वार और सीढ़ियां बनाई गई हैं. दोनों तरफ 435-435 सीढ़ियां हैं. दोनों ओर सीढ़ियां इस तरह से बनाई गई हैं कि अलग-अलग चलने पर भी ऐसा आभास होता है कि लोग एक साथ चल रहे हों. दोनों सीढ़ियां एक-दूसरे के ऊपर दिखाई देती हैं. दूसरी तरफ चलने वाले लोगों को लगता है कि पास चल रहे लोगों के साथ मिलाया जा सकता है, लेकिन सीढ़ियां जहां छत पर खत्म होती हैं लोगों का मिलन वहीं संभव है.

इस तरह का डिजाइन जयपुर के जंतर-मंतर और लखनऊ की भूल-भूलैया में भी इस्तेमाल किया गया है. गिरौदपुरी की छत पर जाने के लिए दो लिफ्ट भी हैं. जैतखाम के चारों ओर खूबसूरत गार्डन है. साइट इंजीनियरों के अनुसार गार्डन को देशी-विदेशी फूलों से सजाया गया है. गार्डन का विस्तार आगरा के ताजमहल और दिल्ली के मुगल गार्डन की तर्ज पर किया जा रहा है. कुतुब मीनार से ज्यादा ऊंचे जैतखाम बनाने की योजना अजीत जोगी की सरकार ने तैयार की थी, पर उसे अमली जामा रमन सिंह सरकार ने पहनाया. इस स्तंभ का निर्माण 2007-08 में 51.43 करोड़ रुपये की लागत से शुरू हुआ.

गिरौदपुरी में बाबा गुरु घासीदास के प्राचीन मंदिर से कुछ कदमों की दूरी पर स्थित जैतखाम के मुख्य प्रवेशद्वार की सीढ़ियों से उतरते ही ताजमहल की तर्ज पर विशाल वॉटर बॉडी बनाई गई है. रात में इस पूल के पानी में जैतखाम की परछाई भी दिखाई देती है. परछाई से ऐसा लगता है कि एक ही स्थान पर दो जैतखाम खड़े हैं. जैतखाम की ऊंचाई 77 मीटर (243 फीट) है, जबकि कुतुब मीनार 72.5 मीटर (237 फीट) ऊंची है.

जैतखाम को बनाने में सात खंभों का उपयोग किया गया है. जैतखाम के अंदर एक विशाल हॉल है. इसके अलावा ऊपर चढ़ते हुए जैतखाम की गोलाई से गिरौदपुरी का नजारा भव्य नजर आता है. पहाड़ी भी ऐसे लगती है मानो उन्हें हाथों से छुआ जा सकता है.

जैतखाम से बाबा घासीदास का मंदिर भी साफ दिखता है. लोक निर्माण विभाग की ओर से सड़क भी बनाई गई है. पिछले वर्ष से लगातार इसका लोकार्पण कई कारणों से टलता जा रहा है. लोकार्पण भले ही न हुआ हो, फिर भी इस अद्भुत जैतखाम को देखने देशभर के लोग पहुंच रहे हैं.

ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, मानवता के पुजारी संत गुरु घासीदास जी का जन्म गिरौदपुरी में 18 दिसंबर सन 1756 को हुआ था. युवा अवस्था में उन्होंने इसी गांव से लगभग छह किलोमीटर की दूरी पर घने जंगलों से परिपूर्ण छाता-पहाड़ के नाम से प्रसिद्ध पर्वत पर कठोर तपस्या की थी और गिरौदपुरी पहुंचकर लोगों को सत्य, अहिंसा, दया, करुणा और परोपकार के उपदेशों के साथ मानवता का संदेश दिया था.

कैसे पहुंचें:

बाय एयर

गिरौदपुरी धाम आने के लिये सबसे नजदीक रायपुर हवाई अड्डा है । यहॉ पहुंचने के बाद सड़क मार्ग से गिरौदपुरी धाम पहुंचा जा सकता है ।

ट्रेन द्वारा

गिरौदपुरी धाम आने के लिये भाटापारा, रायपुर, बिलासपुर एवं महासमुंद रेल्वे स्टेशन हैं । यहॉ पहुंचने के बाद सड़क मार्ग से गिरौदपुरी धाम पहुंचा जा सकता है ।

सड़क के द्वारा

गिरौदपुरी धाम रायपुर, महासमुंद, बलौदाबाजार, भाटापारा, कसडोल, शिबरीनारायण, बिलासपुर, सारंगढ़, बसना आदि शहरों से सड़क माध्यम से पहुंचा जा सकता है ।

PHOTO GALLERY